तिज परिचय पर क्यों मौन तुम हो ?
तिज परिचय पर क्यों मौन तुम हो ?
क्या बताऊ ँ म ै ं तुम्हे कि कौन तुम हो
तम पलाश का बाग हो, तुम कल्याण का राग है।
तुम सात रंगों में रंगी वसंत मे ं ही फाग हो तुम कोहरे में छिया चमकता पूर्णिमा का चांद हो तुम परवा सम उफान पर उर्वशी सा बाँध हो तुम किरवानी का ख्याल हो, तुम मधुवंती का तराना हो श्रृंगार करतो यूँ हो जैस े रति को हराना हो
तुम उच्च शिखर से छल-छल बहती, नवल धारा सी काया हो तुम हरि योगनिद्रा से जन्मी अद्भुत अलौकिक माया हो
तुम कालिदास के काव्य शास्त्र के उच्च रसो का सार हो तुम कामदेव के तरकश में रखें पुष्प बाणो का हार हो
तुम क्षीर सागर में स्नान करती क्षीण कटी बाला हो
बन मोहिनी करे वश मे ं दैत्यों को तुम वैसी हाला हो
इतना सब होने पर भी निज परिचय पर क्यो मौन हो तुम
कुछ रह गया शेष कि और बताऊँ कौन हो तुम |